Wednesday, March 15, 2017

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)
सफर (खंण्ड-2/16 देवदूत)
सफर ( खंण्ड-3 उलझन)
सफर (खंण्ड-4 स्वर्ग-नरक)
सफर (खंण्ड-5 नया आयाम)
सफर (खंण्ड-6 समझ)
सफर (खंण्ड-7 धरर्ती पर वापसी)
सफर (खंण्ड-8 हे इश्वर अभी क्यों नही)
सफर (खंण्ड-9 कल्पना की उडान)
सफर (खंण्ड-10 संगीत)
सफर (खंड-11 इश्वर से मिलने की जिद्द)
सफर (खंड -12 नर्क का अहसाहस)
सफर (खंण्ड- 13 दर्द क्यों)
सफर (खंण्ड- 14 जीवात्मा)
सफर (खंण्ड- 15 पुनर्जन्म)
सफर (खंण्ड- 16 पुनर्जन्म केसे)
जरा एक मिनिट ठहरीये ... इसे लिखते समय मेने इश्वर और स्वर्ग के बारे मे बहुत कुछ कहा है जो पूर्व धारणाओं पर आधारित बस एक कल्पना मात्र है. मै साफ कर देना चाहता हू की यह उपन्यास स्वर्ग और इश्वर के बारे मे कोइ आकलन नही है. यह सच है की मेने इश्वर से बहुत सारे सवाल जीवन और मृत्यु और उसके बाद के बारे मे किये है पर उस तरफ से अभी तक मुझे इस बारे मे कोइ सटीक जबाब नही मिला है जिससे मे इस बारे मे पक्के तोर पर कुछ कह सकू.
मै किसी के विशवास पर चोट नही कर रहा हू की वो कंहा से आया है और मौत के बाद उसे कंहा जाना है. ना ही मै कुछ स्थापित करना चाहता...यह तो बस मौत के बाद की असीम संभवनाओं में से एक की काल्पना है, जिसने जीवन और मौत के पहलुओं को बस छुआ भर है. उम्मीद है इसे पढते समय आप अपनी कल्पनाओं के पंख को पूरी तरह खोलते हुये मेरा साथ एक नये सफर पर चलेगे.
भला को इंटरनेट का की इतनी सारी चेतानाओं के साथ जुडा हुआ हू
खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट

रात के 11 बजे एफ एम पर गाने सुनते हुआ अपनी होंडा कार से इन्दोर भोपाल हाइवे पर भोपल की तरफ जा रहा हू. सडक के बीच बनी सफेद पट्टीया का सम्मोहन हे या पार्टी क असर मेरी आंखे भारी हो रही है. मेने सुस्ती को दूर भगाने के लिये रेडियो की आवाज को तेज कर, दरवाजे का सीसा नीचे किया. ठंडी हवा का तेज झोका मेरे चेहरे से टकराया. मुझे ठंडी हवा अच्छी लगी. दूर तक खाली सडक, मेने एक्सीलेटर पर पेर का दबाब बढाया. नजर स्पीडोमीटर पर गई... 140 की स्पीड के निशान पर नीडल के टच करते ही मेरे सारे शरीर मे एक झुरझुरी महसूस हुई.
140 पर भी कार सधी हुई चल रही है. मै कार की तारीफ मन ही मन करते हुये एक आनंद का अनुभव करने लगा. मेरे सारे शरीर मे रोमांच का नशा. तेजी से गुजरती सफेद पट्टीयां पूरा ध्यान सडक और कान गाने की धुन पर, मस्ती और रोमांच का नशा. काश मे इसे और तेज चला पाता. मेने एक्सीलेटर पूरा दबाया हुआ है .
सामने देखा सडक पर हल्की सी धुंध है, इससे पहले भी इसी तरह की धुंध मेने पहले कई बार पार की है. अकसर सर्दी के दिनों मे एसा होता रहता है ..धुंध के बावजूद मुझे रास्ता दूर तक साफ दिखाई दे रहा है मेने अपनी रफ्तार को कायम रखा. और उस हल्की धुंध कार घुस गई.
एक तेज धमाके के साथ गाडी हवा मे बहुत उपर तक उछल गई. मै कुछ समझ पाता उससे पहले एक साथ बहुत सारे विंड स्क्रीन के कांच के टुकडे मेरे चेहरे से टकराये ...एक तीखा दर्द मेने अपनी पसलियों मे भी महसूस किया. गाडी ने हवा मे एक के बाद एक कई बार गुलाटी ली. भला हो की मेने सीट बेल्ट बांधी हुई थी जिससे मेरा बदन सीट के साथ चिपका रहा. मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा है की यह अचानक क्या हो गया है. ब्लास्ट के साथ एयर बेग फूल कर मेरे से चिपक गया. अभी अच्छी भली तो गाडी चल रही थी. अचानक यह सब क्या हो गया.
एक बार फिर तेज धमाके के साथ गाडी की छत जमीन से टकराइ और छत मेरे सिर से टकराइ. लगा जेसे किसी ने मेरी गरदन तोड दी हो उसके बाद एक गहरी खामोशी या शायद बेहोशी मुझे नही मालुम.
मेन खुद को एक कमरे मे खडा पाया. उसकी दिवारे सफेद रंग की थी. मेरा असंमजस ओर बढ गया जब मेने देखा की उसमे ना कोइ खिडकी है और ना कोइ दरवाजा है. मुझे कुछ समझ नही आ रहा. मेने अपने दिमाग पर जोर डाला. ओह याद आया मेरा तो भयानक एक्सीडेंट हुआ था. और मुझे गंभीर चोट भी आइ थी. मेने अपने हाथ पांव को देखा सब सही सलामत है ...यंहा तक की मेने अपने चेहरे पर भी किसी चोट को महसूस नही किया. मुझे अच्छी तरह याद है की जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था तो मेरे सिर और गरदन पर गहरी चोट लगी थी, सीने मे भी तो पसलियों को तोडता हुआ कुछ घुसा था. मेन सभी जगह हाथ लगाकर देखा सब ठीक लगा. मै जितना सोच रहा हू , उलझता जा रहा हू. ना तो मुझे कोइ चोट लगी थी और नाही यह कोइ अस्पताल का कमरा है. पर मै यंहा पहुचा केसे!
कंही यह सपना तो नही है. क्योंकी एसा केसे हो सकता है की मेरा एक्सीडेंट हो ओर मेरे शरीर पर कोइ चोट ना हो. जब की मुझे अच्छी तरह याद है की मुझे गंभीर चोटे लगी थी. मै यंहा क्यों हू मुझे यंहा कोन लाया है.
मै असंमजस में अपनी गरदन घुमाकर चारों ओर देखता हू. मेने ध्यान से एक बार फिर अपने चारो तरफ देखा इस बार मुझे दिवार के साथ कुछ सीढीयां भी देखाई दे रही है इनमे से कुछ नीचे की ओर कुछ उपर की ओर जा रही है.
ध्यान से देखा... बांयी तरफ एक दरवाजा भी है जो पूरी तरह बंद है. एसा लग रहा है जेसे मे किसी मेट्रो स्टेशन के प्लेट फार्म पर खडा हू ओर मुझे यंहा से मेट्रो ट्रेन पकडनी है पर ना तो यहा मेरे सिवाय कोइ दूसरा यात्री है ना ही रेल की पटरी दिखाइ दे रही है ना टिकट बूथ ना गार्ड ... पूरी तरह शांत माहोल कोइ हलचल नही . एक बात ओर मुझे अजीब लग रही है की इस कमरे मे कंही से भी रोशनी आती नही दिख रही फिर भी कमरा पूरी तरह रोशन है. मै कमरे मे चहल कदमी करने लगा. मुझे अपनी पदचाप की आवाज साफ सुनाई दे रही है वेसे ही जेसे ग्रेनाइट फ्लोर पर चलने से होती है.
हेलो ..मेने किसी तरह हिम्मत कर आवाज लगाइ... कोइ है जो मुझे बताये की इस समय मै कंहा हू और मे यंहा केसे आया....मुझे मेरी ही आवाज गूंजती हुई सुनाइ दे रही है, उसी तरह जिस तरह किसी खाली कमरे मे सुनाइ देती है. मुझे कुछ समझ नही आ रहा है. इतना सब हो जाने के बावजूद न मेरे मन मे कोइ डर है ना कोइ चिंता, पर एक जिज्ञासा जरूर है यह जानने की आखिर माजरा क्या है. यह सपना नही हो सकता क्योंकी सपने मे पहले की घटना इस तरह कोइ याद थोडे ही रहती है...अगर सपना नही तो फिर यह क्या है.
मै एक्सीडेंट को याद करने लगा ..मुझे अच्छी तरह याद है एक्सीडेंट के समय मै 140 के उपर कार चला रहा था. जब मे धुंध से गुजर रहा था तो मेने कुछ देखा था. मै दिमाग पर जोर देने लगा की वो क्या था. शायद वो किसी ट्रेक्टर ट्राली का पिछवाडा था. यस मे सही हू वो किसी ट्रेक्टर की ट्राली ही थी. जो धुंध मे घुल मिल गई और मुझे दिखाई नही दी .
ओह तो कार उस से टकराई थी. मै कुछ कर पाता उससे पहले ही कार उस से जा टकाराई थी. टक्कर इतनी जोरदार थी की कार हवा मे कई फुट उपर हवा मे उछल गई थी. उसके बाद उसने हवा मे ही 2 से 3 गुलाटी ली थी और उसके बाद उसकी छत जमीन से टकराई थी. जिस तरह का पागलपन मेरे उपर था ...140 की स्पीड..यह सब तो होना ही था. मेरे सिर, गरदन और सीने पर जबरदस्त चोट लगी थी .. उसके बाद मुझे कुछ याद नही...अब मे इस कमरे मे हू... कितना समय गुजर गया इसका भी मुझे कोइ अंदाजा नही हो पा रहा है.
मेने एक बार फिर फर्श पर नजर दौडाइ अल्ट्रा क्लीन चमकदार फ्लोर.. कंही कोइ दाग धब्बा नही. मेने जोर से सांस खीची ..मुझे हवा जाती हुई महसूस नही हुई ना ही मुझे कोइ गंध ही महसूस हुई.
मेने एक बात पर ओर गोर किया की मेने इतनी देर मे कोई सांस नही ली थी. उसके बाबजूद ना तो मुझे किसी तरह की घुटन महसूस हुई ना किसी तरह की कोइ बैचेनी महसूस हुई.. मेने अपने ह्रदय की धडकन महसूस करनी चाही कुछ भी मुझे महसूस नही हुआ.
मेने धडकन को महसूस करने के लिये बार बार हाथों को बांयी सीने पर रखा मुझे कुछ भी महसूस नही हुआ. मेने कलाइ पर चेक किया गरदन पर चेक किया हर उस जगह चेक किया जिस कगह मुझे पहले धडकन महसूस होती थी पर मुझे कंही भी धडकन सुनाई नही दी. इतनी देर से ना तो दिल धडक रहा है ना ही सांस ले रहा हू फिर भी आराम से हू
इस पहेली ने मुझे उलझा कर रख दिया. इससे पहले अगर एक मिनिट भी सांस नही लेता था तो मेरा दम फूल जाता था. पर अब एसा नही हो रहा है
मुझे अब बार बार लग रहा है की कंही कुछ बडी गंभीर गडबड है. अगर यह सपना है तो इतनी गहरी चेतना के बाद भी यह टूट क्यों नही रहा है. इससे पहले भी मुझे उल जलूल सपने आये है पर जेसे ही मे इनके प्रति जागरूक हुआ तो थोडे देर बाद वो सपने टूट गये. इस बार भी अगर एसा ही है तो मेरा सपना बस टूटने को है ...हो सकता है इस के बाद मे अपने को किसी अस्पताल के बिस्तर पर पडा हुआ पाउ. हो सकता यह सब डाक्टर द्वारा दिये गये किसी पेन किलर उस बेहोशी के इंजेक्शन का कमाल हो. जिसने मुझे इतने गहरे सपने मे डाल दिया है. कुछ भी हो सकता है.
हो सकता है मै कोमा मे हू!
नही यह कोमा नही हो सकता क्योंकी कोमा मे मरीज सब सुन सकता है महसूस कर सकता है बस रिस्पोंस नही कर पाता. अगर एसा है तो मुझे अब तक किसी की कोई आवाज क्यों नही सुनाइ दी. मै जिस शरीर को देख रहा हू उस पर किसी चोट के निशान क्यों नही है
एक बात पक्की है जिस शरीर को मे देख रहा हू यह मेरा पहले वाल शरीर नही है. क्योंकी इस पर चोट के ताजे निशान तो छोडो, मुझे पुराने निशान तक दिखाइ नही दे रहे है. जिस तरह से मै अपने को ताजा और स्फूर्ति से भरा महसूस कर रहा हू, एसा तो मेने वर्षों से महसूस नही किया.
यह शरीर ना तो सांस ले रहा है ना ही धडक रहा है . ना ही मुझे भूख लग रही है ना प्यास. ना मुझे ठंड का अहसाहस हो रहा है ना गर्मी का. तापमान इतना नियंत्रित केसे हो सकता है की मुझे गर्म और ठंड का अहसाहस भी ना हो. मुझे बार बार लग रहा है की जो मै देख रहा हू महसूस कर रहा हू वो ना तो सपना है और नाही कोमा... तो फिर क्या है.
क्या मै मर चुका हू. इस ख्याल के आते ही एक गहरे खाली पन के अहसाहस से मेरा दिमाग भर गया. इस ख्याल के दिमाग मे आते मै समझ गया की अब मे उस दुनिया मे नही हू जिसमे मे कभी रहा करता था. हो ना हो इस एक्सीडेंट के बाद सच मे मर चुका हू.
उस एक्सीडेंट के बाद मे सही सलामत केसे बच सकता था. जेसे जेसे इस बारे मे ओर सोचता जा रहा हू, यह ख्याल मजबूत होता जा रहा है की मे मर चुका हू. खाली पन का अहसाहस और गहरा होता जा रहा है...हां मे सच अब मे मर चुका हू.
मै अब समझ गया की मै अब मर चुका हू कम से कम धरती पर मेरा शरीर अब मर चुका है. पर मे अब भी देख सुन रहा हू और महसूस कर सकता हू. यहा तक की मे चल फिर सकता हू . चलने फिरने की मुझे कोइ विशेष कोशिश नही करनी पड रही है. सच कहू तो एसा लग रहा है की जेसे मुझे नया शरीर मिल गया हो. उर्जा से भरपूर बेहद लचीला शरीर. मै मर चुका हू इस ख्याल को लेकर ना मुझे कोइ डर लग रहा है न ही मुझे कोइ चिंता महसूस हो रही है बस एक जिज्ञासा है यह जानने की आखिर यह माजरा क्या है.
मै इस कमरे मे कब तक यूंही खडा रहूगा. मुझे सब एक वर्ग पहेली सा लग रहा है जिसे मुझे हल करना है. मै मर चुका हू फिर भी इतना बेफिक्र हू और  आगे जो कुछ भी होने वाला है उसके बारे मे जानने के लिये बेहद उत्सुक हू. यंहा मेरी मदद के लिये कोइ नही है, काश कोइ होता जो मुझे गाइड करता, जिससे मे इस सब के बारे मे पूछ सकता. 
कोइ है जो मेरी मदद कर सके... मुझे बता सके की मै कंहा हू ...हेलो...हेलो...

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