Friday, October 14, 2016

जागो, बंद आंखे खोलो और देखो

चबंल के बिहड हो या फिर बुदेंल खंड का पठारी इलाका. यंहा घर मे भले ही खाने को कुछ भी ना हो, पूरे इलाके मे भुखमरी   और बेहद गरीबी है पर हर घर मे बंदूक होगी. भेसे चराते हुये भी कंधे पर बंदूक लटकाये घूमते है . मजे की बात यह है की जरा जरा सी बात में वे एक दूसरे की जान लेने से नही चूकते और दुश्मनी पुस्त दर पुस्त निभाते चले जाते है.  यह उनकी आन बान और शान का हिस्सा होता है. समझदार लोग उनकी इस नासमझी का मजाक बनाते है और उनके किस्से मजे लेकर एक दूसरे को सुनाते है. 
आज भारत और पाकिस्तान का भी यही हाल है. दोनों देशों की अधिकांश जनता के पास बुनियादी सुविधायें नही है. भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ समस्याये मुह फाडे है. पर इस सब से मूह फेरकर दोनों देश की सरकारे लाखों करोडों रूपया रक्षा के नाम पर खर्च कर रही है दोनों के पास दुनिया की बेहतरीन फौज है, दोनों देशों के पास पूरी दुनिया को कई बार खत्म कर देने लायक हथियार है, . इसके बाबजूद उनके हथियारों की भूख कम लेने का नाम नही ले रही है. अभी हाल मे दोनों देशों ने हजारों करोडों रूपये रक्षा सामग्री पर खर्च किये है और यह बजट आने वाले समय मे बढता ही जायेगा.
दोनों देशों के हालात देखकर बचपन मे सुनी वो कहानी याद आती है जिसमे  दो बिल्लीयों  एक रोटी के टुकडे किये आपस मे झगड पडी और बंदर ने न्याय के नाम पर दोनों की रोटी खुद खा ली और बिल्लीयां एक दूसरे का मूह देखती रह गई. आजादी से पहले तक दोनों देशों का दुश्मन एक था. आज भी दोनों देशों की समस्यायें समान है. कुछ लोगों के पागलपन के कारण ना चाह्ते हुये हमे विभाजित आजादी मिली देश के तीन टुकडे हुये. उसके साथ ही जबरदस्ती की नफरत हुक्मरानों ने एक दूसरे के लिये अपनी जनता के बीच फेलायी जिससे वो खुद को सही और दूसरे को गलत साबित कर सके. दोनों ने इतिहास से कुछ भी ना सीखने की कसम खा रखी है. 
नफरत फेलाने काम बदस्तूर चालू है. दोनों ही तरफ की सरकारे और मिडिया एक दूसरे को गलत साबित करने मे लगी हुये है. दोनों ही नफरत फेलाने का कोइ मोका नही छोड रहे है. दोनों ही देशों मे पडोसी देश की बात करने वाले को देश द्रोही साबित कराने की होड लगी रहती है. एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोइ मौका हाथ से नही जाने देते. एसे मे कुछ देश बंदर की भूमिका निभाते हुये दोनों देशों की हाथियार बेच रहे है, उन्हे उकसा रहे है,  वो कभी नही चाहेगे की दोनों देश दोस्त एक अच्छे मित्र बन जाये, क्योंकी एसा होते ही उनके यंहा भुख मरी के हालात हो जायेगे.
आजादी के बाद तीन युद्ध कर चुके ये दोनों देश चोथे की हसरत पाले हुये है. कहने को तो हम अफगानिस्तान के कबीलों को बर्बर कहते है .... देखा जाये तो हम उनसे किस बात मे कम है. उन्ही की तरह हम भी विरासत मे अगली पीढी को अपने पडोसी के लिये नफरत ही दे रहे है. दोनों ही देश अपने  यंहा पनप रही अलगाववादी ताकतों से परेशान है. असमानता और भुखमरी दोनों ही देश की पहचान है.

अगर दोनों देश सच्चे मित्र बन जाये तो हम विश्व ताकत है, वरना अगर एसा ही चलता रहा तो विश्व के विनाश का कारण भी हम ही बन जाये.    

जागो, बंद आंखे खोलो और देखो

चबंल के बिहड हो या फिर बुदेंल खंड का पठारी इलाका. यंहा घर मे भले ही खाने को कुछ भी ना हो, पूरे इलाके मे भुखमरी   और बेहद गरीबी है पर हर घर मे बंदूक होगी. भेसे चराते हुये भी कंधे पर बंदूक लटकाये घूमते है . मजे की बात यह है की जरा जरा सी बात में वे एक दूसरे की जान लेने से नही चूकते और दुश्मनी पुस्त दर पुस्त निभाते चले जाते है.  यह उनकी आन बान और शान का हिस्सा होता है. समझदार लोग उनकी इस नासमझी का मजाक बनाते है और उनके किस्से मजे लेकर एक दूसरे को सुनाते है. 
आज भारत और पाकिस्तान का भी यही हाल है. दोनों देशों की अधिकांश जनता के पास बुनियादी सुविधायें नही है. भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ समस्याये मुह फाडे है. पर इस सब से मूह फेरकर दोनों देश की सरकारे लाखों करोडों रूपया रक्षा के नाम पर खर्च कर रही है दोनों के पास दुनिया की बेहतरीन फौज है, दोनों देशों के पास पूरी दुनिया को कई बार खत्म कर देने लायक हथियार है, . इसके बाबजूद उनके हथियारों की भूख कम लेने का नाम नही ले रही है. अभी हाल मे दोनों देशों ने हजारों करोडों रूपये रक्षा सामग्री पर खर्च किये है और यह बजट आने वाले समय मे बढता ही जायेगा.
दोनों देशों के हालात देखकर बचपन मे सुनी वो कहानी याद आती है जिसमे  दो बिल्लीयों  एक रोटी के टुकडे किये आपस मे झगड पडी और बंदर ने न्याय के नाम पर दोनों की रोटी खुद खा ली और बिल्लीयां एक दूसरे का मूह देखती रह गई. आजादी से पहले तक दोनों देशों का दुश्मन एक था. आज भी दोनों देशों की समस्यायें समान है. कुछ लोगों के पागलपन के कारण ना चाह्ते हुये हमे विभाजित आजादी मिली देश के तीन टुकडे हुये. उसके साथ ही जबरदस्ती की नफरत हुक्मरानों ने एक दूसरे के लिये अपनी जनता के बीच फेलायी जिससे वो खुद को सही और दूसरे को गलत साबित कर सके. दोनों ने इतिहास से कुछ भी ना सीखने की कसम खा रखी है. 
नफरत फेलाने काम बदस्तूर चालू है. दोनों ही तरफ की सरकारे और मिडिया एक दूसरे को गलत साबित करने मे लगी हुये है. दोनों ही नफरत फेलाने का कोइ मोका नही छोड रहे है. दोनों ही देशों मे पडोसी देश की बात करने वाले को देश द्रोही साबित कराने की होड लगी रहती है. एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोइ मौका हाथ से नही जाने देते. एसे मे कुछ देश बंदर की भूमिका निभाते हुये दोनों देशों की हाथियार बेच रहे है, उन्हे उकसा रहे है,  वो कभी नही चाहेगे की दोनों देश दोस्त एक अच्छे मित्र बन जाये, क्योंकी एसा होते ही उनके यंहा भुख मरी के हालात हो जायेगे.
आजादी के बाद तीन युद्ध कर चुके ये दोनों देश चोथे की हसरत पाले हुये है. कहने को तो हम अफगानिस्तान के कबीलों को बर्बर कहते है .... देखा जाये तो हम उनसे किस बात मे कम है. उन्ही की तरह हम भी विरासत मे अगली पीढी को अपने पडोसी के लिये नफरत ही दे रहे है. दोनों ही देश अपने  यंहा पनप रही अलगाववादी ताकतों से परेशान है. असमानता और भुखमरी दोनों ही देश की पहचान है.

अगर दोनों देश सच्चे मित्र बन जाये तो हम विश्व ताकत है, वरना अगर एसा ही चलता रहा तो विश्व के विनाश का कारण भी हम ही बन जाये.    

Monday, August 29, 2016

Endorphin Effect


Endorphins are hormones and neuropeptides produced in every cell of the body. They play an important role in the relaxation process of tissue as well as in anaesthetizing pain and the physical sensation of pleasure. The production of Endorphins is the body’s natural response to counteract stress and pain.
Endorphins also enhance the immune system by activating natural killer cells and by causing the blood vessels to stay open and flexible to support the flow of blood to all body tissues. They also help prevent many diseases such as strokes and cardio vascular problems.
Endorphins are essential for physical health as well as for psychological wellbeing which this positive feedback loop illustrates: Endorphins produced > positive physical change > enhanced psychological mood > new behaviour.
In order for Endorphins to be released it is only necessary to experience pleasure in the mind by either thinking of pleasure or using the imagination to see it with the inner eye. This is possible because the psycho-neuro-immunological system cannot tell the difference between what is real and what is imagined. What makes the Endorphin Effect so unique is that it is not dependant on outside circumstances but only on the power of the mind. It can, therefore, be used in almost any situation or locality to counteract stress, pain or low mood and to enhance energy levels.
The Endorphin Effect  in brief:
  • Positive Triggers (enjoy every event, activity or thought that gives you pleasure)
  • Inner Smile (give your own body kind attention)
  • Curled Deer (sink and relax into the body language of resting)
  • Biophylia (feel connected with the natural world, spiritual inspirations and the good things in life)
  • Daily Exercise (twenty minutes minimum to raise metabolism and increase oxygenation of the blood)
If you are intrigued by this wonderful way of improving and supporting your health you can learn the Endorphin Effect Strategy to help you manage stress better and become an all round happier person.

Friday, August 5, 2016

real fruit juice..is it really a fruit juice?


Open letter
 Sir/ Madam,
I tasted apple real fruit power 200 gms pack. it is no where near to apple juice. it is more like sugar in water. Nutrition facts printed on the pack also reveals the same.  print on pack indicate that 100gms of juice have 15 gms (12.8g + 2.2g) of sugar. Which is really too much. It appears that this pack is  providing sugar solution in the name of fruit juice,  off course with some fruit essence added to it.

Please indicate fruits by weight used to make one pack. is it  one apple or 1/10th of  apple apple.


Please reply by return mail

durwesh

real fruit juice..is it really a fruit juice?


Open letter
 Sir/ Madam,
I tasted apple real fruit power 200 gms pack. it is no where near to apple juice. it is more like sugar in water. Nutrition facts printed on the pack also reveals the same.  print on pack indicate that 100gms of juice have 15 gms (12.8g + 2.2g) of sugar. Which is really too much. It appears that this pack is  providing sugar solution in the name of fruit juice,  off course with some fruit essence added to it.

Please indicate fruits by weight used to make one pack. is it  one apple or 1/10th of  apple apple.


Please reply by return mail

durwesh

Thursday, August 4, 2016

सेब खाने वाले सावधान

सेब को जल्दी पकाने के लिये इथरेल का प्रयोग किया जा रहा है और उन्हे चमकाने के लिये वेक्स पालिश की जा रही है.  इथरेल और वेक्स का  दुष्परिणाम जानने के लिये गूगल करे  

Tuesday, July 26, 2016

Sugar is drug...white poision


Is sugar bad for you? The Truth Revealed
Is sugar bad for you? Well you probably already suspect the answer, and you’re most probably right. I’m going to share with you the main damaging effects of this sweet poison. If you said sugar is not good for you then you were right, but in all truth it’s fructose that’s not good for you. This ties in nicely with the first point.
Sugar converts directly to fat.
Sugar is made from 50% Glucose and 50% Fructose and the glucose part is the bit which will get metabolized and used as energy, the fructose part will get turned to fat. When you eat 120 calories of glucose, less than one calorie is stored as fat. 120 calories of fructose results in 40 calories being stored as fat, that’s 40x’s more. Consuming fructose is essentially consuming fat!
Why this happens is because every cell in the body, including the brain, utilizes glucose. So that means much of it is “burned up” straight after you consume it.
By contrast, fructose is turned into free fatty acids (FFAs), VLDL (the damaging form of cholesterol), and triglycerides, which get stored as fat.
Fructose makes us eat more.
Every type of molecule we eat has corresponding hormones that regulate our appetite and tell us when we’re full. It’s like having a little person inside your body shouting, “hey you’ve had enough to eat, you can stop now”. The only problem is with fructose is, that doesn’t happen.
You see fructose creates leptin resistance which means that you will still feel hungry and your brain can’t see it.
This is because with leptin resistance you have high levels of leptin from the high fructose intake which makes your brain think you are in starvation mode even though you’re obese, meaning you’ll keep storing much more fat plus you’ll feel hungry when you’re not.
We don’t want that!
Fructose can make us sick.
 Over the years there has been more and more studies into the effects of fructose on the body. These studies have found that fructose:
– Weakens our immune system making it harder to fight of viruses and infections.
– May cause leptin resistance, throwing body fat regulation out of whack and contributing to obesity.
– Causes fertility issues.
– Makes people insulin resistant, which could lead to obesity and type II diabetes
– Is linked to dementia
– Has been linked to all sorts of cancers including ovaries, breast, prostate, rectum, pancreas, lung and stomach.
– Is just plain addictive!
Studies are already proving sugar to be the biggest cause of fatty liver which leads to insulin resistance, which is now being viewed as the biggest precursor to things like heart disease, diabetes and cancer.
It’s a bit of a bummer as sugary treats do taste great but believe me that once you get off the sweet poison you wont miss it one bit and you’ll feel the best you’ve every felt and will wish that you quit sugar a lot sooner.
So now you know the answer to the question Is sugar bad for you, I hope I haven’t scared you but it’s best to know now rather than keep your head buried in the sand.
1.     Sugar can suppress the immune system.
2.     Sugar can upset the body's mineral balance.
3. Sugar can contribute to hyperactivity, anxiety, depression, concentration difficulties, and crankiness in children.
4.     Sugar can produce a significant rise in triglycerides.
5.     Sugar can reduce helpful high density cholesterol (HDLs).
6.     Sugar can promote an elevation of harmful cholesterol (LDLs).
7.     Sugar can cause hypoglycemia.
8.     Sugar contributes to a weakened defense against bacterial infection.
9.     Sugar can increase the risk of coronary heart disease.
10. Sugar may lead to chromium deficiency.
11. Sugar can cause copper deficiency.
12. Sugar interferes with absorption of calcium and magnesium.
13. Sugar can promote tooth decay.
14. Sugar can produce an acidic stomach.
15. Sugar can speed the aging process, causing wrinkles and grey hair.
16. Sugar can increase total cholesterol.
17. Sugar can contribute to weight gain and obesity.
18. High intake of sugar increases the risk of Crohn's disease and ulcerative colitis.
19. Sugar can contribute to diabetes.
20. Sugar can cause cardiovascular disease.
21. Sugar can increase systolic blood pressure.
22. Sugar can cause toxemia during pregnancy.
23. Sugar can contribute to eczema in children.
24. Sugar can overstress the pancreas, causing damage.
25. Sugar can cause liver cells to divide, increasing the size of the liver.
26. Sugar can increase kidney size and produce pathological changes in the kidney.
27. Sugar can cause headaches, including migraines.
28. Sugar can increase blood platelet adhesiveness which increases risk of blood clots and strokes.
29. it increases fungal and yeast growth in the body

Sugar is a drug...white poision

Is sugar bad for you? The Truth Revealed

Is sugar bad for you? Well you probably already suspect the answer, and you’re most probably right. I’m going to share with you the main damaging effects of this sweet poison.Well you probably already suspect the answer, and you’re most probably right. I’m going to share with you the main damaging effects of this sweet poison.
If you said sugar is not good for you then you were right, but in all truth it’s fructose that’s not good for you. This ties in nicely with the first point.

Sugar converts directly to fat.

Sugar is made from 50% Glucose and 50% Fructose and the glucose part is the bit which will get metabolized and used as energy, the fructose part will get turned to fat. When you eat 120 calories of glucose, less than one calorie is stored as fat. 120 calories of fructose results in 40 calories being stored as fat, that’s 40x’s more. Consuming fructose is essentially consuming fat!
Why this happens is because every cell in the body, including the brain, utilizes glucose. So that means much of it is “burned up” straight after you consume it.
By contrast, fructose is turned into free fatty acids (FFAs), VLDL (the damaging form of cholesterol), and triglycerides, which get stored as fat.

Fructose makes us eat more.

Every type of molecule we eat has corresponding hormones that regulate our appetite and tell us when we’re full. It’s like having a little person inside your body shouting, “hey you’ve had enough to eat, you can stop now”. The only problem is with fructose is, that doesn’t happen.
You see fructose creates leptin resistance which means that you will still feel hungry and your brain can’t see it.
This is because with leptin resistance you have high levels of leptin from the high fructose intake which makes your brain think you are in starvation mode even though you’re obese, meaning you’ll keep storing much more fat plus you’ll feel hungry when you’re not.
We don’t want that!

Fructose can make us sick.

Yep it just get’s better and better doesn’t it? Over the years there has been more and more studies into the effects of fructose on the body. These studies have found that fructose:
– Weakens our immune system making it harder to fight of viruses and infections.
– May cause leptin resistance, throwing body fat regulation out of whack and contributing to obesity.
– Causes fertility issues.
– Makes people insulin resistant, which could lead to obesity and type II diabetes
– Is linked to dementia
– Has been linked to all sorts of cancers including ovaries, breast, prostate, rectum, pancreas, lung and stomach.
– Is just plain addictive!
Is sugar bad for you? Sound’s like it is. Sugar is slowly poising us, studies are already proving sugar to be the biggest cause of fatty liver which leads to insulin resistance, which is now being viewed as the biggest precursor to things like heart disease, diabetes and cancer.
It’s a bit of a bummer as sugary treats do taste great but believe me that once you get off the sweet poison you wont miss it one bit and you’ll feel the best you’ve every felt and will wish that you quit sugar a lot sooner.
So now you know the answer to the question Is sugar bad for you, I hope I haven’t scared you but it’s best to know now rather than keep your head buried in the sand.



  1. Sugar can suppress the immune system.
  2. Sugar can upset the body's mineral balance.
  3. Sugar can contribute to hyperactivity, anxiety, depression, concentration difficulties, and crankiness in children.
  4. Sugar can produce a significant rise in triglycerides.
  5. Sugar can reduce helpful high density cholesterol (HDLs).
  6. Sugar can promote an elevation of harmful cholesterol (LDLs).
  7. Sugar can cause hypoglycemia.
  8. Sugar contributes to a weakened defense against bacterial infection.
  9. Sugar can increase the risk of coronary heart disease.
  10. Sugar may lead to chromium deficiency.
  11. Sugar can cause copper deficiency.
  12. Sugar interferes with absorption of calcium and magnesium.
  13. Sugar can promote tooth decay.
  14. Sugar can produce an acidic stomach.
  15. Sugar can speed the aging process, causing wrinkles and grey hair.
  16. Sugar can increase total cholesterol.
  17. Sugar can contribute to weight gain and obesity.
  18. High intake of sugar increases the risk of Crohn's disease and ulcerative colitis.
  19. Sugar can contribute to diabetes.
  20. Sugar can cause cardiovascular disease.
  21. Sugar can increase systolic blood pressure.
  22. Sugar can cause toxemia during pregnancy.
  23. Sugar can contribute to eczema in children.
  24. Sugar can overstress the pancreas, causing damage.
  25. Sugar can cause liver cells to divide, increasing the size of the liver.
  26. Sugar can increase kidney size and produce pathological changes in the kidney.
  27. Sugar can cause headaches, including migraines.
  28. Sugar can increase blood platelet adhesiveness which increases risk of blood clots and strokes.

Wednesday, June 29, 2016

गुलाम बनना तुम्हारी अपनी फितरत है इश्वर की मर्जी नही

प्राकृतिक नियम सब के लिये बराबर है फिर चाहे वो पापी हो, धार्मिक हो, या अधर्मी, चोर हो या साहूकार, बालात्कारी हो, सच्चा हो या झूठा, हिंसक हो या अहिंसक, ब्राहम्ण हो या शूद्र, हिन्दू हो या मुस्लिम.
सब पर समान भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के नियम लागू होते है. सब एक ही हवा मे सांस लेते है एक ही सूर्य की रोशनी को ग्रहण करते है. प्राकृति इसमे कोइ फरक नही करती है. बाढ, भूकंप हो या सुनामी जेसे प्राकृतिक प्रकोप उसके लिये सब इंसान बराबर है. उनका इससे बचना और ना बचना पूरी तरह प्राकृतिक नियम के हिसाब से होगा. विज्ञान ने इन नियमों को समझकर जो प्रगति की है वो किसी से छुपी नही है.
उसी तरह कुछ समाजिक, मनोवैज्ञानिक और अध्यातमिक  नियम है जो प्राकृतिक नियम की तरह निरपेक्ष रहकर काम करते है. वो भी किसी मे फर्क नही करते है सब पर समान तरह से लागू होते है. इन नियमों को समझकर कोइ भी अपनी और अपनों की प्रगति कर सकता है. दूसरों को गुलाम बना सकता है. गुट बना सकता है, उसका संचालन कर सकता है. इसीलिये जब इन नियमों को समझकर उस शक्ति को प्राप्त करने का यत्न करता है तो उस क्षेत्र मे पहले से मोजूद ताकते घबरा जाती है.
गुलाम बनाना एक सोची समझी समाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे पुरातन काल से इस्तेमाल किया जा रहा है.  फिर वो चाहे शरारिक गुलामी हो या मानसिक गुलामी हो. इन नियमों का इस्तेमाल कर अधिसंख्यों को गुलाम बनाया जाता है. जिससे वो उन की मेहनत के बल ताकतवर बन सके और राज कर सके.
सत्ता और ताकत के इस खेल मे कोन सच्चा हमदर्द है और कोन नही उसे गुलाम  मानसिकता मे रह कर समझना आसान नही होता है. क्योंकी उस समय हम किसी ओर की नजरिये से देख रहे होते है. वो गलत बोले तो गलत वो अगर सही बोले तो सही. उस पर भी लोग मानसिक गुलामी के इतने आदी हो जाते है की वो इसे अपनी नियती ही समझ लेते है. एसे मे जो उन्हे इससे मुक्त करना चाहता है, गुलामी के दल दल से निकालना चाहता है वो उन्हे ही अपना दुश्मन समझ बैठते है. उन्हे पता भी नही होता की कोन उनका सच्चा हमदर्द है और कोन उन्हे मात्र अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना चाहता है.
जिन 85% को जगाने की बात हो रही है अगर वो सच मे जाग गये तो यह एक महा विस्फोट से कम नही होगा. जिसे ताकतवर सत्ताधीश कभी नही होने देंगे. साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करते हुये अगर जरूरत पडी तो एसे विद्रोही नेता को या तो लोग खत्म कर देगे या फिर अपने मे शामिल कर लेगे. इस तरह एसा आंदोलन अपने आप खत्म हो जायेगा. कभी जाति , कभी धर्म , कभी अपने , कभी पराये, तो कभी रष्ट्र द्रोही तो कभी रष्ट्र वोरोधी का नाम देकर अधिसंख्यों को खुश और गुमराह करने का काम चलता रहता है.
कुछ दिन पहले गरीबी का विज्ञान पढ रहा था. उसमे एक मजेदार बात कही गई की अमीर अगर अपनी संपत्ती का थोडा सा भाग दान पुण्य करता रहे और उसके भांड उसे बढा चढाकर लोगों को बताते रहे तो एसे अमीर के विरूध गरीब कभी विद्रोह नही करेगा. बल्की  उसे अपना नेता मानकर उनकी पूजा करेगा उनकी हर बात मानेगा. यह एसा ही नियम है जिसे हर समझदार अमीर और ताकतवर आदमी पालन करता आ रहा है. जरूरत पढने पर एसे अमीरों के लिये गरीब मर मिटेगा पर उसका बुरा नही होने देगा. क्योंकी एसे अमीर की इमेज एक दानी और धार्मिक की होती है.
गुलामों को कभी एक जुट ना होंने दो. उन्हे जात पांत धर्म रंग लिंग के नाम पर बांट कर रखो. इस नुस्खे को इस्तेमाल कर अंग्रेजों के 200 साल तक राज किया और इसी का इस्तेमाल कर राजनैतिक पार्टीयां आज भी इस देश में अपना उल्लू सीधा कर रही है.
ये लोग काल्पनिक संकट दिखाकर उन्हे समय समय पर अपने छुपे हुये उद्देशय के लिये इस्तेमाल करते रहते है. जरूरत पडी तो संकट पैदा कर दिया. वो मात्र उन्हे अपने उद्देशय के लिये इस्तेमाल करने के लिये उनकी भावनाओं को इस कदर भडकाते है वो मर मिटने को तैयार हो जाते है. आग भडका कर सही समय पर वंहा से किस तरह खिसकना है वो यह अच्छी तरह जानते है 
एसे ही बहुत से लिखित और अलिखित नियम है जिसे अपनाकर सत्ताधीश ताकतवर बनते है. मजे दार बात यह है की हर शोषक शोषित का इसी तरह से शोषण करता है. यह  आपको हर गल्ली महोल्लों मे भी दिखाई देगा. अनेकता मे एकता का नारा सुनने मे भले ही लुभावना लगता है. लालच, सत्ता का खेल मे आनेकता को घृणा की हद तक भडकाया जाता है. वो इसे हर कीमत पर बनाये रखना चाहते  है. उसके लिये मानवता का खून होता है तो होने दो. मानवता लज्जित होती है तो होने दो हर किसी को अपना धर्म और जाति, संकट मे नजर आती है. देखा नही किस तरह हर दंगे मे भीड लूट, हत्या और बालात्कार का नंगा नाच करती है. सार्वजनिक संपत्ती को बरबाद करती है.
बाजारवाद के इस युग में जब सब कुछ बिकाउ है. जो पहले से ताकत वर है वो और ताकत वर होते जा रहे है. मुक्ती भले ही बलिदान मांगती है. जो इसके लिये तैयार हो गया उसे भी ये लोग केसे अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना है अच्छी तरह जानते है. हम मे से 85% अपने दिमाग का इस्तेमाल इनके हिसाब से घटनाओं का विशलेषण करने मे लगाते है. असल मे हमे विश्वास ही नही होता की हमारी कोइ स्वतंत्र सोच भी हो सकती है. अगर कोइ स्वतंत्र सोच पैदा करता भी है तो एसे लोगों को वो राष्ट्र द्रोही, नकस्लवादी और आंतक वादी घोषित कर देते है सत्ता उन्हे “Enemy of State” घोषित कर देती है.
 इश्वर की मर्जी कभी न समझे. इश्वर का इस सबसे कोइ लेना देना नही है. गुट बनाना हमारी नियती है. क्योंकी पुरातन काल से ही यह समझ आ गया की गुट मे रहना अकेले रहने से ज्यादा सुरक्षित और आसान है. स्वतंत्र सोच जेसा कुछ नही है. जिंदा रहने का पूरा खेल गुट बनाने का है. गुट होगा तो कोइ नेता होगा. और बाकी उसके रास्ते पर चलने वाले होंगे. उन्हे आप उस नेता का गुलाम कह सकते है. पहले मुझे यह समझ नही आता था की केसे हजारों लाखों लोग की भीड ये लोग जुटा लेते है. पर अब समझ आ रहा है. हो सकता आप सब को भी यह सब समझ आ रहा होगा.
आप की मर्जी की आप किन गुटों को अपना समझते है और किसे पराया. जब कोइ सिरफिरा आपकी भावनाओं को भडका रहा हो तो अपनी चेतना का इस्तेमाल करते हुये निर्णय करे. किसी को भी अपना नेता तो बना सकते है पर उसे अपना भगवान बनाने की भूल कभी ना करे. उसके अंधभक्त ना बने.
एक बात अच्छी तरह समझ ले जो आप दूसरों के साथ करते है, आज नही तो कल वो सब आप के साथ भी होगा. आज आप किसी को काट रहे है कल इसी तरह कोइ आपको काटेगा. आज आपको मोका मिला तो आपने लूटा ...कल उसे मोका मिलेगा तो वो आप को लूटेगा. यह सिलसिला चलता रहेगा जब तक की आप यह समझ नई जाते  की आप इस जगत मे लूटने के लिये नही आये है.
गुलाम बनना तुम्हारी अपनी फितरत है इश्वर की मर्जी नही. 


Thursday, June 9, 2016

पुनर्जन्म

एक अवधारणा है कि आदमी जब मरता है तो उसकी जीवात्मा उसमे से बाहर निकल जाती है और इस ज़िन्दगी के कर्मो के अनुसार उसको दूसरा शरीर मिलता है। अलग-अलग धर्मो और सम्प्रदायों में इस बात के लिए अलग-अलग सोच है। ज्यादतर वैज्ञानिक इसे धार्मिक अंधविश्वास मानते हैं पर  कुछ वैज्ञानिक इस पर रिसर्च कर रहे हैं।
यह अब भी कुछ हद तक रहस्य है की मृत्यु के बाद हमारी चेतना का क्या होता है.  भारत में पुनर्जन्म के बारे में बहुत प्राचीन काल से मान्यता  हैं। हिन्दूजैनबौद्ध धर्म के ग्रंथों में इस बारे मे बहुत कुछ कहा गया है।
यह माना जाता है कि जीवात्मा अमर होती है और जिस तरह इंसान अपने कपड़े बदलता है उसी तरह वह शरीर बदलती है। उसके अगले जन्म पिछले जीवन के पुण्य या पाप कि वजह से मिलता है। पश्चिमी देशों में भी कुछ जगहों पर इन धारणाओं को माना जाता है। प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरातप्लेटो और पैथागोरस भी पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे। वैज्ञानिकों में शुरू में इस विषय पर बहुत बहस हुईकुछ ने इसके पक्ष में दलीलें दीं तो कुछ ने उन्हें झूठा साबित करने कि कोशिश कीकुछ विज्ञानिकों ने कहा यदि यह सच है तो लोग अपने पिछले जन्म की बाते याद क्यों नहीं रखतेऐसा कोई भौतिक सबूत नहीं मिलता है जिससे आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में जाते हुए साबित किया जा सके. फिर भी कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर रिसर्च किया और कुछ मनोविज्ञानिक पुनर्जन्म को मानकरइसी आधार पर मनोविकारो और उससे संबधित शरारिक बिमारीयों का इलाज कर रहे है।
पुनर्जन्म को लेकर मेरे मन मे भी शुरू से जिज्ञासा रही की चर्वाक के उस सिद्धांत को मानू की जीवन के खत्म होते ही सब कुछ समाप्त हो जाता है. कुछ नही बचता. मिट्टी का शरीर मिट्टी मे मिल जाता है. चेतना शरीर के साथ ही समाप्त हो जाती है. या कृष्ण की बात को मानू की जीवात्मा अजर अमर है. शरीर के खत्म होने के बाद भी अगर कुछ बचा रह जाता है तो वो जीवात्मा है जो जन्म और मृत्यु के अनगिनित चक्र से गुजरती हुई अनेकानेक अनुभव प्राप्त करती है. मुझे इन दो विचारों मे से किसी एक को चुनना है. क्योंकी इसी आधार पर मुझे अपनी बाकी बची जिदंगी केसे गुजारनी है यह तय करना है. क्योंकी अगर एक ही जन्म है तो फिर काहे का समाज और देश ... लूटो खाओ और मौज करो. उसके लिये किसी को मारना पडे तो मार दो... बस कानून की नजरो से बचे रहो वरना इसी जन्म मे नर्क के दर्शन (जेल) हो जायेगे. और अगर पुनर्जन्म है तो फिर मुझे अपने हर कर्म के प्रति चेतन रहना पडेगा. मुझे अपने कर्म सोच समझकर करने होंगे.   
आज मै अपनी खोजों और दलीलों से अपने दिमाग को समझा सकता हू की पुनर्जन्म होता है. एसी बहुत सी दलीलों मे से कुछ दलीले आप के सामने रख रहा हू जिस से आप भी मेरी तरह इस बात को समझ कर अपनी जिदंगी के बारे मे तय कर सके की आप को अपनी जिदंगी मे क्या करना है.
यह एक खुली बहस है इसलिये आप की शंकाये और तर्क मेरे सिर आंखो पर ...मुझे नही पता की आप के सभी प्रश्नों का जबाब मेरे पास है. फिर भी मुझे आप के प्रश्न जानकर खुशी होगी जिससे मे अपनी मान्यताओं का एसिड टेस्ट कर सकू. अभी तो मेरा यह पूर्ण विश्वास है की पुनर्जन्म होता हैऔर इसी विश्वास के साथ जिदंगी बसर कर रहा हू , की मुझे हर किये का नतीजाआज नही तो कल भोगना है.   
डार्विन की क्रमिक विकास बताता है कि मछली पानी से बाहर आईवो हवा में सांस नही ले सकी. इसलिये हवा मे सांस लेने के लिये उसने गलफडे विकसित कर लिये. जब उसे जमीन पर चलने की इच्छा हुई तो उसके फिंस पेर में बदल गये और जब उसने उडना चाहा तो फिंस पंख में बदल गये. यह बात मुझे हजम नहीं हो पा रही है कि मछली ने चाहा और उसने अपने शरीर में बदलाव कर लिया क्योंकी मेंने भी बहुत चाहा की में भी हवा में उड सकू पर ऐसा कुछ नहीं हो पाया की मेरे पंख उग आते या ऐसा ही कुछ हो जाता. मेंने जब भी पानी में डुबकी लगाइ तो मुझे सांस लेन के लिये तुरंत बाहर आना पडा. बहुत चाहने पर भी मुझे समझ नही आ पा रहा की पानी में सांस ले पाने के लिये अपने को कैसे बदलू.
जिस बदलाब की बात डार्विन ने समझाने की कोशिश की वो एक जन्म में संभव नहीं था. शायद बदलाव कि रफ्तार इतनी धीमी रही होगी की जो बदलाव जीव चाह रहा होगा वो कई जन्मों मे संभव हुआ होगा. वो चाह कर भी अंश भर इस जन्म में नहीं बदल सकते एसा कभी नही हुआ की किसी ने उडना चाहा और वो रातोंरात पंखो का मालिक बन गया. इसका मतलब यह हुआ की बदलाव उस शरीर का संभव नहीं है जो पैदा हो चुका है. और जो पैदा नही हुआ उसे केसे मालूम है की उसे क्या चाहिये और क्यों चाहियेअगर विज्ञान की मानेतो जिसे बदलाब की जरूरत थी वो तो उसी शरीर के साथ खत्म हो गया.
इसका मतलब बदलाव तभी संभव है की जब उसे पिछले जन्म मे क्या भोगा उसे क्या बदलाव चाहिये वो उसे याद रहे. तभी तो वो अपनी रचना बदल सकेगा. और जो बदलाव हो रहे है उसे हर जन्म में एक सही दिशा दे सकेगा. अगर ऐसा है तो यह तो पुंनर्जन्म से ही सभंव है...पर विज्ञान तो पुंनर्जन्म को नहीं मानता. सच तो यह है की अगर आप थ्योरी आफ इवोल्यूश्न पर विश्वास करते हो तो आप को पुनर्जन्म पर भी विश्वास करना होगा.

क्रमिक विकास सिद्धांत में एक और दलील दी जाती है कि उत्त्पत्ति अनियमितआकस्मिकनिरुद्देश्यबेतरतीबक्रम रहितऔर  सहसा उत्पन्न घटनाओं का परिणाम है और प्राणी का शरीर विकास और बदलाव इन्ही घटनाओं का परिणाम है..मुझे इसमे कोई दम नजर नही आता.  इतना परिष्कृतजटिल और विवेकी शरीर सिर्फ सहसा उत्पन्न घटनाओं का परिणाम नही हो सकता.
क्या आप यह मानने को तैयार है की लोहे का ढेरकुछ कांच और रबर के सहसा अचानक बेतरतीव मेल से कार बन सकती है. नही ना..अगर कार जेसी साधारण चीज अगर बेतरतीव मेल का परिणाम नहीं हो सकती तो फिर चारों तरफ दिखाई देते करोडो जीव कैसे अनियमितआकस्मिकनिरुद्देश्य घटनाओ का प्ररिणाम हो सकते है.

इसके लिये यादों और अनुभव का बने रहना जरूरी होगा जो जीवन के बाद भी बना रहे. क्योंकी इवोल्यूश्न एक ही जन्म मे संभव नही होता है वो जन्मों जन्मों तक चलने वाली निरतंर प्रक्रिया है. जो survival of fittest  के साथ जुडी है. जिन्होने अपनी चेतना का विकास कर अपने शरीर मे जरूरी फेर बदल किये वही आगे जिंदा रह सके. बाकी सब इतिहास बन गये.  
इसी तरह दूसरा उदाहरण बच्चे के जन्म का है. जब तक बच्चा मां के पेट मे होता है तो उसे गर्भ नाल से सभी जरूरी पोषण मिलता रहता है गर्भ उसे पूरी तरह से सुरक्षित वातावरण देता है जिसमे वो विकास करता रहता है. जन्म के समय उसे मां का गर्भ छोडना पडता है और  उसका सामना बाहरी वातावरण से होता है. गर्भ से बाहर आने की पूरी प्रक्रिया मे वो मात्र जीवत मांस का जीता जागता पिण्ड भर होता है जिसमे कोइ हरकत नही होती.
जब उसे मां की नाल से अलग किया जाता है या उसे मां की नाल से जीवन मिलना समाप्त होता है. उसके बाद क्या होता है?  क्योंकी जिस मां के गर्भ मे वो है वंहा सांस लेने की जरूरत नही थी. असल मे उसे इसका ज्ञान भी नही होता की वो सांस भी ले सकता है. हां जरूरत पडने पर यदा कदा अपने हाथ पांव जरूर चलाता रहता है जिसे मां अकसर महसूस करती है.
गर्भ से बाहर आने के बाद भी उसे इस बात का ज्ञान नही होता है की अब उसे सांस लेना है. जन्म लेने के बाद भी वो एक तरह से मृत प्राय होता है. नर्स उसे दोनों टांगो से उल्टा कर उसके पिछाड पर चांटे मारती है. उसकी थोडी सी कोशिश के बाद वो अचानक जोर से सांस लेते हुये रोने लगता है. सब को लगता है की नर्स के चांटे मारने से एसा हुआ. अब तक मुझे भी एसा ही लगता थापर अब नही लगता क्योंकी रोबोटिक और कम्प्यूटर प्रोगार्मिंग की जानकारी के बाद मै यह दावे से कह सकता हू की रोने और सांस लेने की सरल सी प्रक्रिया उसकी स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया नही हो सकती क्योंकी वो सब किसी प्रशिक्षित दिमाग से ही संभव है. सवाल यह है की उसे यह प्रशिक्षण कब और केसे मिला. यह सब देखने मे भले ही सरल लगता हो पर है नही.  उसे केसे मालुम की उसे केसे रोना है या केसे सांस लेना है. अगर उसे पता होता तो वो मां के गर्भ मे भी एसा ही करता और नतीजा हम सब को मालुम है उसके बाद क्या हुआ होता.
बाहर आने के बाद उसका दम घुट रहा होता है पर वो सांस नही ले सकता. उसे तो पता भी नही होता की उसका जीवन खतरे मे है. फिर अचानक जेसे उसकी चेतना का विस्फोट होता हैऔर उसे सांस लेना आ जाता है ... उसके बाद दूध पीने का लिये वो बैचेन होने लगता है. यह ज्ञान उसे अचानक कंहा से मिला ... मेरा मानना है यह संभव हुआ चेतना के पुनर्जन्म से. जेसे ही चेतना उसके शरीर को पूरी तरह अपने नियंत्रण मे ले लेती है तो उस चेतना को मालुम है की जीने के लिये सांस लेनी है और उसे चेतना को यह भी मालुम है की सांस केसे लेनी है. और वो सांस लेने लगता है... उसके साथ ही वो जोरदार  तरीक से अपने हाथ पेर पटकता है.
मेने जब एक रोबोट प्रोग्रामर से पूछा की अगर उसे नवजात बच्चे के रोने और सांस लेने की हूबहू क्रिया को रोबोट को सीखाना है तो उसे कितने instruction देने  होंगे . मुझे जानकर आश्चर्य हुआ जब उसने बताया की कम से कम उसे 2000 लाइन instruction की जरूरत होगी. मुझे विश्वास नही हुआ. तब उसने बताया की एक एक मांसपेशी जो उसके रोने और सांस लेने से जुडी हैउसे बताना होगा के उसे कब और केसे और कितना खिचांव और उसे कब और कितना ढीला छोडना है गले की मांस पेशियों को बताना होगा की उसे केसे हवा के दबाब को नियंत्रित करना है और जीभ को बताना होगा की उसे केसे हवा को काटना है की रोने की अवाज निकल सके. और उस सब का फीडबैक के लिये मुझे कोड लिखने होंगे जो यह बता सके की किस मे कितना खिचांव है और कोन कितना ढीला है. उसके लिये मुझे सही दर्द का अहसाहस भी पैदा कराना होगा.
यह बिकुल वेसा ही है जेसा आप से शास्त्रीय गान करने को कहा जाये. मुझे नही लगता की आप एसा कुछ कर पायेगे. उस बच्चे के लिये रोना किसी शास्त्रीय गान से कम कठिन नही जिसे वो कुछ सेकेंड मे सीख लेता है. क्योंकी वो उसकी चेतना मे अब मोजूद है...अब अगर उसकी चेतना मे शास्त्रीय गायन की यादे मोजूद है तो वो भी थोडी सी कोशिश के बाद कोइ भी गुरू उसे वह सब याद दिला देगा.  
आप कह सकते है यह सब उसने मां और बाप से DNA के रूप में पहले ही उसने पा लिया होगा और समय आने पर उसने वही सब किया जो उसे करना चाहिये... अगर एसा होता तो पैदा होते ही रोना शुरू कर देता ...सांस लेना शुरू कर देते...एक अंतराल क्यों होता. एसे बहुत से बच्चे होते है जो जन्म के बाद सांस नही ले पाते और उनका शरीर नीला पडता जाता है और अगर उन्हे वेंटीलेतर नही रखा जाये तो कुछ देर बाद मृत हो जाते है. एसा सिर्फ इस लिये हुआ होगा क्योंकी किसी कारण वश किसी भी चेतना ने उसका शरीर ग्रहण नही किया.
बच्चे के जन्म की यह घटना पुनर्जन्म का एक ठोस सबूत हैएक डाक्टर और नर्स से बेहतर इस  घटना का कोइ साक्षी  नही हो सकता की उस पल मृत प्राय बच्चे मे केसे अचानक चेतना का संचार होता है. जेसे उसमे चेतना का महा विस्फोट हुआ हो... जेसे उस रोबोट शरीर के दिमाग मे पूरा प्रोग्राम डाल दिया गया हो. 
बच्चे जन्म के बाद जिस तेजी से सीखते है वो किसी को भी अचंभित कर सकता है. इस बात को किसी रोबोटिक इंजिनियर से पूछो और उसकी प्रतिक्रिया जानो. एसा वो इसलिये कर पाते है की अवचेतन मे वो सब पहले से ही मोजूद होता है.
यही वजह है की मोर्जाट चार वर्ष की अवस्था में संगीत कम्पोज कर सकता था। ‘लार्ड मेकाले’  और विचारक ‘मील’  चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक ‘जान गास’ तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्व में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारथ हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे। प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना और अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। चौपाया स्वत: ही चलना सीख जाता है। पक्षी आसानी से उडना सीख जाते है. इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरना इन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है.
एसे सेकडो उदाहरण है जिन से पता चलेगा की उनके घर खानदान मे कोइ संगीतकार नही थाडांसर नही थापेंटर नही था  और बच्चे ने विपरीत परिस्थितियों मे भी वो सब सीखने की जिद्द की और मौका मिलने पर वो उसने इस सहजता से किया जेसे उसे पहले से ही सब पता हो.
इंटरनेट  पर एसे हजारों वैज्ञानिक शोध मिल जायेगे जिस मे उन्होने पिछले जन्म की यादों का मामलों पर खोजबीन की है. उसमे से बहुत से मामले वो अब तक झुठला नही सके. अगर एक भी मामला असली मे सही है तो फिर मेरे पूर्वजन्म के कथन को बल मिलता है. यह सच है की एसी घटनाओं मे जेसे जेसे बच्चे बढे होते जाते है वो भूलते जाते है जेसे हम अपने सपनों को भूल जाते है. जैसे-जैसे वो संसार में व्यस्त होते जाते हैं वो सूक्ष्म लोकों और पृथ्वी पर अपने पिछले जन्मों को भूल जाते हैं । हमारी भौतिक इंद्रियां यानी पंचज्ञानेंद्रियांछठी ज्ञानेंद्रिय उन यादों को पूरी तरह से ढंक लेती हैं । यह हम पर ईश्वर की कृपा ही है कि उन्होंने वह व्यवस्था की है कि हम पिछले जन्मों के विषय में भूल जाते हैं । अन्यथा अपने इस जीवन के क्रियाकलापों को संभालते हुए पूर्वजन्म के संबन्धों का भी स्मरण रहना कितना कष्टप्रद होता ।
कल्पना करो कि कोई बच्चा यदि पानी में जाने से डरता हैतो हो सकता है उसके मां बाप और रिश्तेदारों ने उसके अदंर यह भय बैठाया होगा. अगर एसा नही है तो यह तय है कि पिछले जन्म में उसकी मौत पानी में डूबने से हुई होगीया फिर उसकी मौत के पीछे पानी ही कोई कारण रहा होगा। इसी तरह हम सब सांप से डरते है कुछ तो इस कदर डरते है की उसका चित्र देखाकर भी उनका चेहरा भय से सफेद हो जाता है. जब की इस जन्म मे उन्होने कभी सांपो का सामना नही किया. वंही कुछ आसानी से सांप से एसे खेलते है जेसे वो कोइ रस्सी का टुकडा हो. आप ओरों की छोडीये आप अपने अदंर मोजूद डर का विशलेष्ण करेगे तो कुछ डर आप एसे पायेगे जिस का कोइ सिर पैर नही है.  
कुछ मनोविज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करने लगे है कि हमारी कई आदतें और परेशानियां पिछले जन्मों से जुड़ी होती हैं। कई बार हमारे सामने ऐसी चीज़ें आती है या ऐसी घटनाएं घटती हैंजो होती तो पहली बार हैं लेकिन हमें महसूस होता है कि इस तरह की परिस्थिति से हम पहले भी गुजर चुके हैं। चिकित्सा विज्ञान इसे हमारे अवचेतन मन की यात्रा मानता हैऐसी स्मृतियां जो पूर्व जन्मों से जुड़ी हैं। बहरहाल पुनर्जन्म अभी भी एक अबूझ पहेली की तरह ही हमारे सामने है। ज्योतिषधर्म और चिकित्सा विज्ञान ने इसे खुले रूप से या दबी जुबान से स्वीकारा तो है लेकिन इसे अभी पूरी तरह मान्यता नहीं दी है।
पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है। पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता हैमात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होतीवैसे ही हम यह क्यों नही मान लेते की चेतना का नाश नहीं हो सकता। चेतना तो ऊर्जा से भी उच्चतम अवस्था हैं।
चेतना का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है। जब भौतिक जगत मे कई पदार्थ मिलकर नई रचना कर सकते है और बने रह सकते है तो उसी प्रकार चेतना भी अपनी र्विकास कर सकती है.  
हमारा भौतिक शरीर पांच तत्वों पृथ्वीजलअग्निवायु और आकाश से मिलकर बना है। मृत्यु के पश्चात शरीर पुन: इन्हीं पांचों तत्वों में विलिन हो जाता है और चेतना  शरीर से  मुक्त हो जाती  है। एक समय तक मुक्त रहने के पश्चात आत्मा अपने पूर्व कर्मों, संस्कारों और इच्छाओं  के अनुसार पुन: एक नया शरीर प्राप्त कर सकती है। इस प्रकार जीवात्मा का जन्म मृत्यु  चक्र चलता रहता है।

मै कुछ स्थापित नहीं करना चाहता...मुझे जो पता था ईमानदारी से रख दिया है...सच तो मै भी जानना चाहता हूँ,,,किसी पक्ष के भी तर्क मुझे आसानी से पचते नहीं....विज्ञान का विद्यार्थी हूँआप सभी से एक अनुरोध है....आप शोध करें,,अनुभव लिखें.... मुझे जो समझ आया मैंने लिखा है,,,...लिखने के पीछे कारण आप लोगों से मार्गदर्शन की ही है. जब तक सच जान नही लेता खुद को अज्ञानी ही समझूगाखोज लगातार जारी रहेगी. मन सवाल करता रहेगा और उसके जबाब की खोज मे लगा रहेगा. सहिष्णु होकर सभी संभावनाओं पर विचार करते रहना चाहिये. भला को इंटरनेट का की इतनी सारी चेतानाओं के साथ इतनी आसानी से संपर्क मे हू .