Wednesday, September 9, 2015

हिंदी पखवाडा

हिंदी पखवाडा चल रहा है, भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन का उदघाटन माननीय मोदी जी के हाथ द्वारा होना है. भोपाल शहर उनके मुस्कराते चहरे वाले पोस्टर से पट गया है.  कुछ दिन इस सम्मेलन की समाचारों मे चर्चा रहेगी उसके बाद
...उसके बाद क्या ?
Image result for hindi उसके बाद उसे भुलाकर लोग अपनी रोजमर्रा की जिदंगी अंग्रेजी से आसान बनाने लग जायेगे. आजादी के बाद से हम एसा ही तो कर रहे है, क्योंकी हिन्दी का महिमामण्डन करने वाले सिर्फ दिखावा कर रहे हैं, उन्होने हिन्दी को अंग्रेजी के बाद दोयम दर्जे का स्थान दिया गया है. 68 साल बाद भी सिर्फ हिन्दी के ज्ञान से कोई आई.ए.एस., आई.पी.एस., न्यायाधीश, या राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से अभियंता, चिकित्सक या प्रबंधक नहीं बन सकता. देश में शासन-प्रशासन, न्यायालय व पेशेवर सेवाओं में ऊंचे पदों पर अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वाले ही बैठ सकते हैं. हिन्दी या स्थानीय भाषा में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले निचले पदों पर ही अपनी सेवाएं दे सकते हैं. यह कितने शर्म की बात है. अंग्रेजों के समय की गुलामी की व्यवस्था अब भी कायम है. अंग्रेजी जानने वाले स्थानीय भाषा बोलने वालों पर राज कर रहे हैं. अब शासक वर्ग की चमड़ी का रंग बदल गया है. वह देखने में अपने देश-वासियों जैसा दिखता है किंतु सोच में अभी भी अंग्रेज़ ही है.
संविधान में तो कल्पना की गई थी कि आजादी के 15 वर्षों के अंदर हम अंग्रेजी से छुटकारा पा जाएंगे. किंतु स्थिति उल्टी हो गई. जिन विद्यालयों में हिन्दी में ही पढ़ाई होती रही अब वंहा भी अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. 
हमारी गुलाम मानसिकता ने हमको अंग्रेजी के चंगुल से मुक्त नहीं होने दिया. दुनिया के ज्यादातर देश अपनी स्थानीय भाषा में ही शिक्षा देते हैं. जो लोग यह मानते हैं कि खासकर तकनीकी विषय जैसे अभियांत्रिकी या चिकित्सा की पढ़ाई हिन्दी या अन्य किसी भारतीय भाषा में नहीं हो सकती है, उन्हें सोचना चाहिए कि रूस, चीन या जापान कैसे उच्च शिक्षा अपनी भाषाओं में ही देते हैं और किसी भी मायने में अमरीका, इंग्लैण्ड या यूरोप के किसी देश से कम नहीं हैं, बल्कि कुछ मामलों में उनसे आगे ही हैं.
यदि कोई वाक़ई में हिन्दी प्रेम प्रदर्शित करना चाहता है तो देश में शिक्षा का माध्यम हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं को बनाने की बात करनी चाहिए. हिन्दी का इस्तेमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए.
हम सब यह महसूस करते है की इस देश को अपनी भाषा चाहिये. एक एसी भाषा जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और गुजरात से लेकर नागालेंड तक सबकी अपनी हो. इसलिये हिन्दी को बहुजन भाषा के रूप मे चुना गया. उस पर गेर हिन्दी भाषीयों और खुद हिन्दी भाषीयों ने अपने संक्रीण स्वार्थों के लिये राजनिती कर उसे सही अर्थों मे राष्ट्र भाषा नही बनने दिया.
दर्द बहुत है पर यह मौका दर्द दिखाने का नही, उसे खत्म करने के बारे मे कुछ कर गुजरने का है, मेरे दिमाग मे एक आइडिया है कृपया गोर फरमायें ..
क्यों ना हम उस भाषा की बात करे जो ना हिंदी है ना इगलिश ना उर्दू है ना मराठी और ना ही वो तमिल है. एक जन सामान्य की भाषा, उसमे सभी भाषाओं के प्रचलित शब्द हों जिससे किसी को यह शिकायत ना रहे कि उसे अनदेखा कर दिया. 
एक बात ओर पूरे भारत मे लिखने की एक ही लिपी का इस्तेमाल हो. अगर मानक लिपी मे अन्य भाषा का कोई विशेष स्वर वाला अक्षर ना हो तो उसे उसमे जोडा जा सकता है. इस मानकीकरण  से पूरे भारत मे एक जेसा लिखा जा सकेगा. अभी तो तमिल नाडू में तमिल में तो केरल में मलियाली मे तो बंगाल में बँगला, आन्ध्रा में तेलगू मे लिखा होता है.   अगर किसी एक लिपी का इस्तेमाल हो, तो कम से कम उसे हर भारतीय पढ तो सकता है. अभी तो हाल यह है की दूसरे राज्यों के लोग बसों पर लिखी जगह का नाम तक नहीं पढ पाते. 
एक लिपी होने से दूसरे राज्यों की भाषा को सीख़ना भी  आसान हो जायेगा. जब अंग्रेजी  खुले दिल से दूसरे भाषा से शब्दों को आयात कर अपने को दिनों दिन विकिसित करती जा रही है तो फिर हम अपनी भाषा के साथ एसा क्यों नही कर सकते.
अगर आपको लगता है की हिंदी को इस देश की प्रथम भाषा होनी चाहिये तो राजनिती से उपर उठकर पहले कम से कम इतना भर कर ले की देवनागरी लिपी को सभी जगह लिखने के लिये इस्तेमाल करे. अगर जरूरी हो तो इसमे नये अक्षर जोडे जा सकते है. अरे...इसे ही तो भाषा का विकास कहते है. या उसे भी हम राजनीती में उलझा देना चाहते है.
हमें बाते कम और काम ज्यादा करना है. नहीं तो हम और आप हिंदी और अंग्रेजी करते रह जायेगे....और कोई  हमारे वतन में ही हमे अजनबी बना देगा.   
जो लाखों करोडों किताबे और इंटर नेट पर ज्ञान है उस सबका अनुवाद हिंदी मे करना है. जिस दिन एसा कर पायेगे ...हिंदी इस देश की क्या वो विश्व भाषा बन जायेगी. अगर सच में आप 150 करोड़ हो तो उसे काम से साबित करो.  कुछ लोग इस काम मे लगे हुये है...आप चाहो तो आप भी उनके साथ मिल जाओ...वरना शोर ना मचाओ. ना ही राज नेता की तरह बाते करो. जेसे अपुन आज कर रहा है...
 काम करो... . अगर आप भाषाई राजनिती से उपर नही उठोगे तो नीचे जाओगे...अरे नीचे जाओगे क्या ...आपकी दुआ से नीचे जा रहे है.
वेसे हम बेशर्म लोग है जी. कितना भी बुरा भला कहा लो हम वो काम नहीं करेगे जो दिल कहता है, हम वो काम करेगे जो हमसे डंडे की चोट पर कराया जाता है. या फिर पैसा फेंक कर हमसे कोई भी काम करा लो....यार कुछ तो बोलो...भगवान भला करे आपका 

Tuesday, September 8, 2015

Monday, September 7, 2015

खाद्य तेल का सच !


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स्वास्थ रहना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. बहुराष्ट्रीय और देशी कंपनीयों का नैतिक दायित्व है की वो हमे स्वास्थ खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराये पर एसा नही हो रहा है. बहुराष्ट्रीय और उनका अनुसरण करने वाली बेकरी और रेस्टारेंट सारे मानको को ताक पर रखकर स्वादषिट जहर परोस रही है. एक एसा धीमा जहर जिसका असर तुरंत नही होता पर वो आज करोडो लोगों को डायबटीज, ह्रदय रोग, रक्त चाप, गठीया जैसी अनेको बिमारी का कारण बन उन्हे मौत के मूह मे धकेल रहा है. सरकारे खामोश है, डाकटर चुप है, हमारे सुपर स्टार खिलाडी और अभिनेता करोडों कमाने की लालच मे झूठा विज्ञापन कर लोगों को भ्रमित कर रहे है.   
आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइंड तेल के बारे में जानता नहीं थाये पिछले 20-25 वर्षों से हमारे देश में आया हैकुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैंइन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जमकर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात कोतब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू कियाडोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइंड तेल लिखना शुरू किया कि तेल खाना तो सफोला का खाना या सनफ्लावर का खानाये नहीं कहते कि तेलसरसों का खाओ या मूंगफली का खाओ, नारियल का खाओ
अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता हैतेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक Fatty Acid है,  अगर चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायबतेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट हैशुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, 4-5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों मेंआप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल कंहा रहा.
तेलों  का परिष्करण और रिफाइनिंग के दौरान उसे उच्च तापमान पर कई बार गर्म किया जाता है और घातक रसायनों का प्रयोग किया जो तेल मे ट्रांस फेट का निर्माण करते है यह लोग बीज से पूरा तेल निकालने के लिये पेट्रोलियम रसायन हेग्जेन का प्रयोग करते है. वेसे तो यह प्रक्रिया मे तेल से लग कर लिया जाता है पर इसकी थोडी सी भी बची हुई मात्रा हमारे स्वास्थ के लिये बेहद हानीकारक होती है एसे ही और भी बहुत से हानीकारक रसायन यह कंपनीया  इस्तेमाल करती है जिसकी कोइ जानकरी यह आम नागरीक को उपल्बध नही करती
यह बढे दुर्भाग्य की बात है की तेल के सेल्फ लाइफ बढाने के लिये और उसे रंगहीन, गंध हीन बनाने के लिये तेल निर्माता बेशर्मी की हद तक खतरनाक रसायनों और प्रक्रियाओं का प्रयोग करते है. ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैंघुटने दुखनाकमर दुखनाहड्डियों में दर्दये तो छोटी बीमारियाँ हैंसबसे खतरनाक बीमारी हैहृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिसब्रेन का डैमेज हो जानाआदिआदि, जिन घरों मे रिफाइन तेल खाया जा रहा है वंहा ये सब बिमारियां अब ज्यादा हो रही है|
शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotin), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर मेंवैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध देशी तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे|
अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा हैमलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस मेंवहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता हैहम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैंवो एक-दो टन नहींलाखो-करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है| 7-8वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दुसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATTसमझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है|भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइयेरिफाइन तेल और डबल रिफाइन तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है उसमें पूरी संभावना है की उसमें पामोलिन तेल भी होगाआपको बता दें पामोलिन तेल का इस्तेमाल ज्यादातर साबून बनाने मे होता था. पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है और ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी घुलता  नहीं हैंकिसी भी तापमान पर  नहीं और ट्रांस फैट जब शरीर में  नहीं घुलता है तो वो बढ़ता जाता है और यह  हृदयघात, ब्रेन हैमरेज का एक बढा कारण बनता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है|
आजकल फास्ट फूड के नाम पर समोसे, पकोडे, आलू चिप्स का चलन है. रेस्टारेंट मालिक इन्हे तेल को बार बार गर्म कर उसमे इन्हे सेंकते रहते है और एसा तेल तेल के नाम पर जहर बन जाता है जो हम समोसे और अन्य खाद्य के साथ उसे खाते रहते है. होना तो यह चाहिये की तेल को कभी भी गर्म का करना पडे. उसे कच्चा ही लिया जाये जेसे हम सब्जी कमे घी डालते है या फोर रोटी पर घी चुपड कर खाते है. पर आज तेल को तलने के लिये इस्तेमाल किया जाता है. इसके बावजूद की तला हुआ खाने पर मजबूर है.   तेल को कम से कम गर्म करे. तलने के लिये कभी अगर इसे इस्तेमाल करना भी पडे तो उसी तेल को दुबारा तलने के लिये इस्तेमाल कभी ना करे.  


रिफाइंड तेल की जगह कच्ची घानी का निकला  मूंगफ़लीसरसोंतिल, olive का तेल ही खाएँ ! 


अजीब दांसता है ये

रवीश जी,
 
तेहल्का डाट कोम पर आपके लेख ने  नव पत्रकारों को कनफूसिया दिया है. आप कुछ ज्यादा ही सेंटीमेंटल हो गये. जो आपने लिखा वो सिर्फ पत्रकारिता का ही सच नही है ...ये आज हर व्यवसाय की सच है. चंद कुछ लोग ही चमक पाते है बाकी के बस दिन काटते है. 
बहुत कम को बचपन से पता होता है की उसे क्या बनना है और उसमें भी कुछ के ही मां बाप और गुरुजन उसकी इस चाह्त को प्रतिभा मे बदल पाते है. अधिंकाश तो भेडचाल के मारे होते है. जिधर हवा चली उधर ही बह लिये क्योंकि उन्हे तो जरूरत है बस एक अदद नोकरी की जो उत्तम वेतन दिलवा सके. अब अगर वो बजारू पत्रकारिता से मिलता तो वही सही. वेसे भी 24×7 चलते न्यूज चेनलों से इससे ज्यादा की उम्मीद बेमानी है. और अखबारखुदा खेर करे..आपने देखा नही ये सब खबरों से ज्यादा तो विज्ञापन बेचते है ( ओह सारी दिखाते है). 
अजीब दांसता है येकंहा शुरू कंहा खत्म, ये मंजिले है कोन सी ना तुम समझ सके ना हम