Friday, January 6, 2012

गुम हो चली भोपाल और नवाबों की पहचान

नवाब और तांगा वर्षो से भोपाल की पहचान रहे है। लेकिन ये दोनों चीजें इस शहर से धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। नवाब तो रहे नहीं, शहर की सड़कों पर तांगा भी अब इक्का दुक्का ही दिखते है।एक दौर था जब भोपाल में आवागमन का एक मात्र साधन तांगे हुआ करते थे। इसे तो लोग नवाबों की सवारी मानते थे। हो भी क्यों न इनकी चमक-दमक कुछ इस तरह की होती थी कि इस पर सवारी करने वाला अपने आप को नवाब ही समझ बैठता था। तांगे भी कई किस्मों के होते थे। कुछ तांगे बग्घी जैसे होते थे, उनकी सजावट हर किसी का मन मोह लेती थी तो कुछ आम तांगे भी होते थे। इनमें सवारी करने वाले लोग एक दूसरे से पीठ मिलाकर बैठते थे। भोपाल के तांगों की पूरे देश में चर्चा रही है। फिल्म नया दौर में तो दिलीप साहब ने भोपाल के पास की एक घाटी में तांगा दौड़ाया था।आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। तांगों की जगह अब आटो और बसों ने ले लिया है। जो तांगा बचे है उनमें सवारियां नहीं बल्कि सामान ढोया जाता है। तांगे की सवारी का शौक रखने वाले लोगों का दिल अब तांगों की हालत को देख कर बैठ जाता है। घोड़ों की खुराक के लिए हर रोज कम से कम सौ रुपये की जरूरत होती है। जब से मिनी बस और आटो का प्रचलन शुरू हुआ है तब से लोगों का तांगों से मोहभंग हो गया। इसकी वजह यह है कि तांगे की सवारी थोड़ी महंगी है और वक्त भी ज्यादा लगता है। ऐसे में तांगा चलाना उनके लिए मुश्किल हो गया है। इसलिए वे सवारी ढोने के बजाए माल ढोना ज्यादा पसंद करते है।भोपाल से गुम हो रहे तांगों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग को भोपाल कार्निवाल के दौरान इस मामले में जन जागरण लाने के लिए तांगा राइडिंग का आयोजन करना पड़ा। तमाम कोशिशों के बावजूद केवल सात तांगों का ही इंतजाम हो पाया।यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में नवाबों के किस्सों की तरह तांगों की कहानियां भी अगली पीढ़ी सुनेगी।



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